प्रेमानंद जी महाराज ने बताया होली मनाने का असली कारण ध्यान से सुनो भक्तों ये पौराणिक कथा!

04 मार्च 2026 को होली के पावन अवसर पर आयोजित सत्संग में Shri Premanand Ji Maharaj ने साधकों को ऐसा आध्यात्मिक मार्ग बताया, जो सीधे आत्मकल्याण और परम शांति की ओर ले जाता है। उनका संदेश स्पष्ट, सरल और जीवन को भीतर तक झकझोर देने वाला था—“यह मनुष्य जीवन केवल खाने-पीने, कमाने-खर्चने या यश पाने के लिए नहीं मिला है; यह ईश्वर को पाने की अमूल्य साधना का अवसर है।होली, जो रंगों और उल्लास का पर्व है, उसी दिन महाराज जी ने आत्मा को रंगने की बात कही ऐसे रंग में जो कभी फीका न पड़े। उन्होंने समझाया कि संसार के रंग क्षणिक हैं, पर नाम-रंग और भक्ति-रंग शाश्वत हैं।

सृष्टि सुधारने नहीं, स्वयं को सुधारने आए हैं”

महाराज जी ने कहा कि साधक का लक्ष्य पूरी दुनिया को बदलना नहीं होना चाहिए। संसार को सुधारने की चिंता में मनुष्य अक्सर स्वयं को भूल जाता है। उन्होंने उदाहरण देकर समझाया कि जब स्वयं भगवान अवतार लेकर आए, तब भी उन्होंने सबको नहीं बदला। परिवर्तन उसी के जीवन में आया जिसने नाम-स्मरण, समर्पण और शरणागति को अपनाया।

यह संदेश आज के समय में और भी प्रासंगिक है, जब लोग समाज, राजनीति, व्यवस्था या दूसरों की कमियों पर अधिक ध्यान देते हैं, पर आत्मचिंतन से दूर भागते हैं। महाराज जी के शब्दों में पहले अपने मन को भगवान के चरणों में झुकाइए, संसार अपने आप सही दिखने लगेगा।

माया की तीन गहरी खाइयाँ: साधक के लिए सबसे बड़ी परीक्षा

भक्ति-मार्ग पर चलने वाले को तीन प्रमुख बाधाएँ रोकती हैं—कंचन, कामिनी और कीर्ति। महाराज जी ने इन तीनों को माया की गहरी खाइयाँ बताया, जिनमें गिरकर साधक अपने लक्ष्य से भटक जाता है।

1. कंचन – धन का मोह

धन अपने आप में बुरा नहीं, लेकिन उसका मोह साधना के लिए बाधक है। महाराज जी ने कहा कि धन का संग्रह, विशेषकर अपने नाम और अहंकार के लिए, साधक को धीरे-धीरे भीतर से कठोर बना देता है। उन्होंने समझाया कि जो व्यक्ति दृढ़ता से भजन करता है, उसका प्रारब्ध भी क्षीण हो जाता है। इसलिए चिंता और संचय से अधिक भरोसा और भजन आवश्यक है।

उन्होंने यह भी कहा कि आवश्यकताओं की पूर्ति ईश्वर स्वयं करते हैं। अनावश्यक संचय केवल भय और असुरक्षा को बढ़ाता है।

2. कामिनी – इंद्रिय सुखों का आकर्षण

इंद्रिय विषयों का आकर्षण साधक के मन को चंचल बनाता है। विरक्ति का अर्थ केवल बाहरी त्याग नहीं, बल्कि भीतर की आसक्ति से मुक्त होना है। यदि मन विषयों में ही उलझा रहे, तो बाहरी साधुता भी टिक नहीं पाती।

महाराज जी ने चेताया कि विषय-संग साधक को धीरे-धीरे पतन की ओर ले जाता है। इसलिए सजगता, संयम और सत्संग अत्यंत आवश्यक हैं।

3. कीर्ति – मान-सम्मान का मोह

धन और भोग का त्याग अपेक्षाकृत सरल हो सकता है, लेकिन मान-सम्मान की चाह छोड़ना अत्यंत कठिन है। कीर्ति का मोह मनुष्य को भीतर से बाँध लेता है। प्रशंसा की अपेक्षा और आलोचना से दुख ये दोनों ही साधक की स्थिरता को तोड़ देते हैं।महाराज जी के अनुसार, जो व्यक्ति अपमान में भी शांत और सम्मान में भी विनम्र रहे, वही सच्ची भक्ति का अधिकारी है।

सच्चे संबंधों की पहचान कौन है वास्तव में अपना?

सत्संग में एक महत्वपूर्ण विषय था ।संबंधों की वास्तविकता। महाराज जी ने कहा कि वही गुरु, माता-पिता या मित्र सच्चे हैं । जो हमें भगवान की ओर प्रेरित करें। जो संबंध ईश्वर-स्मरण से दूर ले जाए, वह चाहे कितना ही मधुर क्यों न लगे, अंततः बाधक है।आज की शिक्षा और जीवनशैली भौतिक सफलता पर केंद्रित हो गई है। प्रतियोगिता, उपलब्धि और प्रतिष्ठा की दौड़ में आत्मा का स्वर दब जाता है। महाराज जी ने याद दिलाया कि जीवन का मूल उद्देश्य आत्मोद्धार है। आत्मा को उसके स्रोत से जोड़ना।

वृंदावन वास और वैष्णव मर्यादा की गंभीरता

महाराज जी ने विशेष रूप से वृंदावन में रहने वालों के लिए सावधानी का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि वैष्णव अपराध अर्थात किसी भक्त की निंदा, दोष-दृष्टि या अवमाननासबसे बड़ा आध्यात्मिक नुकसान कर सकता है।उन्होंने समझाया कि दोष देखने की प्रवृत्ति हमारे पुण्य को भी क्षीण कर देती है। यदि अज्ञानवश कोई गलती हो जाए, तो अहंकार नहीं, बल्कि गुरुदेव की शरण ही एकमात्र उपाय है। क्षमा और प्रार्थना से ही हृदय की शुद्धि संभव है।

होली का वास्तविक रंग भक्ति और समर्पण

होली के दिन दिया गया यह संदेश केवल उत्सव का उपदेश नहीं था, बल्कि जीवन को दिशा देने वाला सूत्र था। महाराज जी ने कहा कि जैसे होली में लोग रंगों में सराबोर हो जाते हैं, वैसे ही साधक को नाम-रंग में भीग जाना चाहिए।संसार के रंग कुछ समय बाद धुल जाते हैं, पर भगवत-प्रेम का रंग जीवन भर और जन्मों तक साथ रहता है। यह रंग तभी चढ़ता है, जब मनुष्य अपने भीतर की अशुद्धियों—अहंकार, लोभ, वासना और मान-बड़ाई को त्यागने का साहस करे।

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