अमेरिका और ईरान के बीच हाल ही में हुए समझौते को लेकर एक बार फिर अनिश्चितता के बादल मंडराने लगे हैं। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने साफ कर दिया है कि दोनों देशों के बीच हुआ समझौता अभी अंतिम रूप से तय नहीं हुआ है। ट्रंप ने कहा कि फिलहाल यह केवल एक समझौता ज्ञापन (Memorandum of Understanding) है और आगे की स्थिति इस बात पर निर्भर करेगी कि ईरान समझौते की शर्तों का कितना पालन करता है। उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि यदि ईरान ने तय नियमों का उल्लंघन किया या अमेरिका की अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतरा तो अमेरिका दोबारा सैन्य कार्रवाई करने से पीछे नहीं हटेगा। ट्रंप के इस बयान के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह चर्चा तेज हो गई है कि अमेरिका और ईरान के बीच तनाव पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है और भविष्य में हालात फिर बिगड़ सकते हैं।
ट्रंप ने समझौते को “बेहद मजबूत” बताते हुए दावा किया कि इससे वैश्विक बाजारों को राहत मिली है। उन्होंने कहा कि दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में शामिल होर्मुज जलडमरूमध्य अगले एक-दो दिनों में पूरी तरह खुल सकता है। इससे तेल आपूर्ति और वैश्विक ऊर्जा बाजार को स्थिरता मिलने की उम्मीद है। हालांकि, ईरान के पुनर्निर्माण के लिए अमेरिका की ओर से किसी बड़े आर्थिक पैकेज की संभावना को ट्रंप ने पूरी तरह खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि अमेरिका ईरान को एक डॉलर भी नहीं देगा और न ही किसी प्रकार का निवेश करेगा। हाल ही में सामने आई 300 अरब डॉलर की संभावित सहायता संबंधी रिपोर्टों को भी उन्होंने गलत बताया। ट्रंप ने स्पष्ट किया कि अमेरिका का ध्यान केवल सुरक्षा और समझौते के पालन पर है, आर्थिक सहयोग पर नहीं।
खाड़ी देशों की भूमिका पर बोलते हुए ट्रंप ने कहा कि अमेरिका किसी भी देश पर ईरान में निवेश करने का दबाव नहीं बना रहा है, हालांकि यदि कोई देश ऐसा करना चाहता है तो उसे कोई आपत्ति नहीं होगी। इसके साथ ही ट्रंप ने 2015 के ईरान परमाणु समझौते (JCPOA) को लेकर पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा पर भी हमला बोला। उन्होंने आरोप लगाया कि ओबामा प्रशासन ने समझौते के बदले ईरान को 1.7 अरब डॉलर नकद देकर रिश्वत देने की कोशिश की थी। ट्रंप ने दावा किया कि उनकी सरकार ने ऐसा कोई कदम नहीं उठाया है। ट्रंप के ताजा बयानों से यह स्पष्ट है कि अमेरिका फिलहाल ईरान के प्रति सतर्क और सख्त रुख बनाए हुए है। अब पूरी दुनिया की नजर इस बात पर है कि ईरान समझौते की शर्तों का पालन करता है या नहीं, क्योंकि इसी पर दोनों देशों के रिश्तों और क्षेत्रीय स्थिरता का भविष्य निर्भर करेगा।